शुक्रवार 1 मई 2026 - 07:39
मज़दूर दिवस: इज़्ज़त, मेहनत और इंसानी हक़ूक़

मज़दूर दिवस: इज़्ज़त, मेहनत और इंसानी हक़ूक़

लेखक: मौलाना सैयद अली हाशिम आब्दी

हौज़ा / इंसानी समाज की बुनियाद मेहनत, ईमानदारी और आपसी सहयोग पर क़ायम है। क़ौमों की तरक़्क़ी का राज़ सिर्फ़ संसाधनों में नहीं होता, बल्कि उन हाथों में भी होता है जो दिन-रात मेहनत करके इन संसाधनों को कारगर बनाते हैं। यही मज़दूर और मुलाज़िम तबक़ा है जो ख़ामोशी से तारीख़ रचता है, मगर अफ़सोस कि इतिहास के पन्ने इनके शोषण, महरूमी और बेबसी की दास्तानों से भी भरे हुए हैं। ताक़तवर तबक़े ने अक्सर इस कमज़ोर मगर खु़लूस वाले तबक़े को अपने मफ़ादात की भेंट चढ़ाया, इसकी मेहनत को नज़रअंदाज़ किया और इसके हक़ूक़ को पामाल किया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,इंसानी समाज की बुनियाद मेहनत, ईमानदारी और आपसी सहयोग पर क़ायम है। क़ौमों की तरक़्क़ी का राज़ सिर्फ़ संसाधनों में नहीं होता, बल्कि उन हाथों में भी होता है जो दिन-रात मेहनत करके इन संसाधनों को कारगर बनाते हैं।

यही मज़दूर और मुलाज़िम तबक़ा है जो ख़ामोशी से तारीख़ रचता है, मगर अफ़सोस कि इतिहास के पन्ने इनके शोषण, महरूमी और बेबसी की दास्तानों से भी भरे हुए हैं। ताक़तवर तबक़े ने अक्सर इस कमज़ोर मगर खु़लूस वाले तबक़े को अपने मफ़ादात की भेंट चढ़ाया, इसकी मेहनत को नज़रअंदाज़ किया और इसके हक़ूक़ को पामाल किया।

मज़दूर दिवस इसी जद्दोजहद, कुर्बानी और बेदारी की निशानी है। लेकिन अगर हम इस्लामी नज़रिए से देखें तो मालूम होता है कि इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले ही वे उसूल तय कर दिए थे, जिन तक दुनिया बहुत देर से पहुँची।

रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम ने मेहनत की अज़मत को सिर्फ़ अल्फ़ाज़ में नहीं बल्कि अपने अमल से भी वाज़ेह किया। र'वायत में है कि आपने एक मेहनतकश (मज़दूर) के हाथों को चूम लिया। यह सिर्फ़ एक बोसा नहीं, बल्कि मेहनतकश तबक़े की इज़्ज़त और तक़रीम का हमेशा के लिए ऐलान है।

अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की सीरत भी इस बाब में रौशन और रहनुमाई से भरपूर है। अमीरुल मोमिनीन इमाम अली अलैहिस्सलाम, जो खुद मेहनत और इंसाफ़ का पैकर थे, फ़रमाते हैं: “किसी इंसान की क़द्र-ओ-क़ीमत उसकी मेहनत और अमल से पहचानी जाती है।” आप खुद कुएँ खोदते, खेतों में काम करते और अपनी मेहनत की कमाई को राह-ए-ख़ुदा में ख़र्च करते थे। आपने हुक्मरानों को यह सबक़ दिया कि जनता के साथ ऐसा बर्ताव करो जैसे एक मेहरबान बाप अपनी औलाद के साथ करता है, न कि एक ज़ालिम आक़ा अपने ग़ुलामों के साथ।

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैं: “मज़दूर की मज़दूरी उसके पसीना सूखने से पहले अदा करो।” यह हदीस सिर्फ़ वक्त पर अदायगी की अहमियत ही नहीं बताती, बल्कि इसमें इंसानी हमदर्दी और इंसाफ़ का पैग़ाम भी है।

इमाम मूसा काज़िम अलैहिस्सलाम से र'वायत है: “अल्लाह उस शख़्स से मोहब्बत करता है जो हलाल रोज़ी कमाने के लिए मेहनत करता है।” यह तालीम बताती है कि मेहनत सिर्फ़ दुनिया की ज़रूरत नहीं बल्कि एक इबादत भी है, बशर्ते वह हलाल तरीक़े से हो।

इमाम अली रज़ा अलैहिस्सलाम का वह वाक़िआ भी बहुत अहम है, जिसमें आपने बिना मज़दूरी तय किए किसी मज़दूर से काम लेने पर नाराज़गी ज़ाहिर की। आपने साफ़ फ़रमाया कि मज़दूर का हक़ पहले तय होना चाहिए और उसके साथ किसी क़िस्म की नाइंसाफ़ी जायेज़ नहीं।

इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम की सीरत हमें मज़दूरों और ख़ादिमों के साथ हुस्ने सुलूक की दावत देती है। आप अपने ख़ादिमों के साथ इस क़दर मोहब्बत और एहतराम से पेश आते थे कि वे खुद को ग़ुलाम नहीं बल्कि घर का मेंबर महसूस करते थे। ईद के दिन ग़ुलामों को आज़ाद करना आपका मामूल था, मगर इस अंदाज़ से कि जुदाई का ग़म आज़ादी की खुशी पर भारी पड़ जाता था।

इस्लाम ने मज़दूरों और मुलाज़िमों के हक़ूक़ को एक मुकम्मल निज़ाम की शक्ल में पेश किया है। इनमें चंद अहम उसूल ये हैं:

1. मज़दूरी में इंसाफ़ किया जाए ताकि मज़दूर अपनी बुनियादी ज़रूरतें पूरी कर सके।

2. काम शुरू करने से पहले मज़दूरी तय की जाए।

3. मज़दूरी की अदायगी में देर न की जाए।

4. मज़दूर को उसकी ताक़त से ज़्यादा काम पर मजबूर न किया जाए।

5. गैर-इरादी नुक़सान का बोझ मज़दूर पर न डाला जाए।

6. मुश्किल हालात में मज़दूर का साथ दिया जाए।

7. काम के दौरान होने वाले नुक़सान की ज़िम्मेदारी मालिक पर हो।

8. मालिक और मज़दूर के दरमियान रिश्ता एहतराम, भाईचारे और हमदर्दी पर क़ायम हो।

आज के दौर में जब सरमायादारी निज़ाम ने फिर से मज़दूर को मशीन का पुर्जा बना दिया है, इन तालीमात की अहमियत और भी बढ़ जाती है। हमें सोचना होगा कि क्या हम वाक़ई इन उसूलों पर अमल कर रहे हैं या सिर्फ़ मज़दूर दिवस मना कर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी समझ लेते हैं।

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि अगर हम एक इंसाफ़ पर मबनी और खुशहाल समाज चाहते हैं तो हमें अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की तालीमात को अपनी ज़िंदगी में अपनाना होगा। मज़दूर को उसका हक़ देना, उसकी इज़्ज़त करना और उसके साथ इंसाफ़ करना न सिर्फ़ एक समाजी फ़र्ज़ है बल्कि एक दीनी ज़िम्मेदारी भी है।

बारगाह-ए-इलाही में दुआ है कि वह हमें इंसाफ़, रहम और इंसानियत के इन बेहतरीन उसूलों पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और हमें हर क़िस्म के ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी से महफ़ूज़ रखे। आमीन

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